Skip to main content

"मेरा शहर बीमार"कविता - Bimar Shahar Poem In Hindi

Hindipoems|


"मेरा शहर बीमार" - Bimar Shahar Poem In Hindi 

वो बुझी बुझी आँखों वाला लड़का ,

जो चौराहे पर मुझे मिला ,

उसी में मुझे बतलाया की ,

मेरा शहर बीमार है  |

शहर की नब्ज तेज़ है  ,

गलिया गर्माहट उछलती है ,

सच ,

मेरा शहर बीमार है  |

याद आता है मुझे

आंगन , गली , चबूतरा

अपना कूदना

चोट , ख़ून , पट्टी और

माँ की डांट

फिर आँखों में उभरते है

भाले , चाकू , फरसे , लाठी ,

बन्दूक , गोली , खून , लाशें और चीखे

सच

मेरा शहर बीमार है |

मुझे उनके नाम की हिचकी आती है

जो शहर के कंधो पर खड़े है ,

उनकी सेहत के लिए जरूरी थे |


कुछ जुलुस / हंगामे

उन्ही की तंदरूस्ती की खातिर

"मेरा शहर आज बीमार है "

See More Poems -

Hindi poem In hindi




Comments

Popular posts from this blog

करमैती बाई का जीवन परिचय ( Karmaiti Bai Biography In Hindi )

करमैती बाई - 

महावीर स्वामी का जीवन परिचय और उपदेश ( Biography Of Mahavir Swami and Updesh )

महावीर स्वामी का जीवन परिचय और उपदेश (Biography Of Mahavir Swami )-- महावीर स्वामी विक्रम संवत के पाँच सौ वर्ष पहले के भारत की बहुत बड़ी ऐतिहासिक आवश्यकता थे । इन्होनें सुख-दुख मे बंधे जीव के लिए शाश्वत दिव्य शान्ति और परम् मोक्ष का विधान किया । महावीर स्वामी जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थकर थे । जैन धर्म की स्थापना त्रिषभदेव ने की थी । महावीर स्वामी ने इसके विकास मे अहम योगदान दिया था । इन्होने जैन धर्म को पुर्ण तपोमय बना दिया । महावीर स्वामी का प्रारंभिक जीवन -- वैशाली राज्य की सीमा पर गण्डकी नदी के तट पर क्षत्रियकुण्डनपुर नगर के राजा सिध्दार्थ और माता त्रिशला के यहा महावीर स्वामी का जन्म हुआ था । संन्यास से पुर्व इनका नाम वर्धमान था । इनके जन्म से पहले इनकी माता को चौदह विचित्र सपने आये थे । चैत्र मास की शुक्ला त्रयोदशी को सोमवार के उपाकाल मे महावीर स्वामी ने शिशु वर्धमान के नामरूप जन्म लिया । शिशु का का रंग तपे सोने के समान था । शान्ति और कान्ति से शरीर शोभित और गठीत था । माता-पिता ने बड़ी सावधानी से उनका पालन-पोषण किया । रानी त्रिशला अत्यंत गुणवती व सुंदर थी । सिध्दार्थ...

अस्थियों को गंगा मे क्यों प्रवाहित करते है ?

अस्थियों को गंगा मे क्यों प्रवाहित करते है ? हिंदु मान्यताओं के अनुसार  मृत्यु के उपरान्त जीवात्मा का अपने शरीर की भस्म मे मोह रह जाता है । जब तक मृतात्मा की भस्म को पवित्र गंगा मैया मे प्रवाहित नही कर दिया जाता तब तक मृतात्मा को शांति नही मिलती । इसलिए शव को तत्काल दाह कर दिया जाता है और जैसे ही चौथे दिन भस्म हाथ छुने योग्य हो जाती तब उसे पवित्र गंगा मैया मे प्रवाहित कर दिया जाता है ।  इस प्रकार मृतात्मा को विलक्षण आंनद की अनुभव होता है और आत्मा परलोक की और प्रस्थान करती है । पंचाग अस्थियों को धार्मिक भाषा मे "  फुल  " कहा जाता है  यावदस्थिनी गंगायां तिष्ठन्ति पुरूषस्य च । तावद्वष्रसहस्त्राणि ब्रह्मलोके महीयते ।। अर्थात् - मृतक की अस्थियां  जब तक गंगा मे रहती है तब तक मृतात्मा ब्रह्मलोक मे निवास करता हुआ आनन्दोपभोग करता है ।  विज्ञान का मत - विज्ञान के अनुसार नदियों मे अस्थियां प्रवाहित करने से एक अन्य लाभ भी है । गंगा नदी कैलाश पर्वत से लेकर बंगाल की खाड़ी तक लंबा सफर तय करती है । जो सहस्त्रो वर्गमील भुमी को सींच क...