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करमैती बाई का जीवन परिचय ( Karmaiti Bai Biography In Hindi )

करमैती बाई - 


करमैती बाई भगवान श्री कृष्ण की बहुत बड़ी भक्त थी | मीरा बाई के समान अपने सम्पूर्ण जीवन को कृष्णभक्ति में लगा दिया |

करमैती बाई का जीवन परिचय ( Karmaiti Bai Biography In Hindi )


नश्वर पति-रति त्यागि कृष्णपदसो रति जोरि  ।
सखै जगत फाँस तरकि तिनुका ज्यो  तोरी    ।।



जयपुर के पास खण्डेला नामक स्थान था । वहा शेखावत सरदार राज्य किया करते थे । पण्डित परशुराम यहा के राजपण्डित थे । इन्ही परशुरामजी के यहा सद्गुणी करमैती बाई का जन्म हुआ । करमैती बाई का मन बचपन से ही भगवद्भक्ति मे लगा था । वह निरन्तर श्री कृष्ण के नाम का जाप किया करती थी और एकान्त स्थल मे भगवद् ध्यान लगाया करती थी । करमैती बाई का भगवान श्री कृष्ण के प्रति अथाह प्रेम था । वह भगवान का जाप जाप करते करते रोने लगती थी ।


निर्मल कुल काँथड़ा धन्य धरसा जेहि जाई ।
करि वृंदावन -  वास संत सुख करत बड़ाई ।


अब करमैती बाई की उम्र विवाह योग्य हो चुकी थी । माता-पिता  सुयोग्य वर की तलाश करने लगे लेकीन करमैती बाई को विवाह की बातें नही सुहाती थी । वह लज्जावशं माता के सामने कुछ नही बोल पाती थी । इच्छा न होते हुए भी पिता की इच्छा से करमैती का विवाह हो गया । परन्तु वह अपने आप को पहले ही श्री कृष्ण को समर्पित कर चुकी थी ।

संसार - स्वाद सुख त्याग करि फेरि नही तिनतिन चही ।
कठीनकाल कलयुगमह करमैती रही निःकलंक ।।


उसके ससुराल वाले उसे लेने आ गये । उसे पता चला की उसके ससुराल वाले भगवान को नही मानते । वे वैष्णवो और संतो के विरोधी है । वहा उसे अपने ठाकुरजी की सेवा का मौका नही मिलेगा । यह सब सोच कर वो व्याकुल हो उठी । उसको एक ही रास्ता नजर आ रहा था ।

रात्रि के समय करमैती बाई अकेले ही घर से निकल पड़ी । उसे अब किसी का भय नही रहा । करमैती बाई रात्रि के अंधकार मे चली जा रही थी उसे यह सुधि नही की मैं कौन हुँ और कहा जा रही हुँ ।

दिसि अरू विदिसि पंथ नहि सुझा ।
को मै  चलेऊ  कहा   नहि    बुझा ।।


करमैती की माता ने जब बेटी को घर मे नही पाया तो रोती हुई अपने पति परशुराम के पास जाकर यह दुः सवांद सुनाया । परशुराम को बड़ा दुख हुआ । एक तो पुत्री का स्नेह और दुसरा लोक -  लाज का डर । राजपण्डित होने के कारण परशुराम राजा के पास गये और सारा वृतान्त कह सुनाया । राजा ने सहानुभुति प्रकृट करते हुए चारो ओर अपने घुड़सवार दौड़ाये ।


दो घुड़सवार उस दिशा मे भी गये जिस दिशा मे करमैती जा रही थी । घोड़ो की टाँपो की आवाज सुनायी दी । तब करमैती को समझ मे आ गया की ये उसकी ही तलाश मे आ रहे है । उसने चारो और नजर दौड़ाई कुछ नजर नही आ रहा था सिवाय रेगिस्थान के । पास मे एक मरा हुआ ऊँट पड़ा था । सियारो और गिध्दो ने उसके पेट़ को फाड़ कर सारा माँस बाहर निकाल डाला था । करमैती बाई उस ऊँट के पेट मे जा छिपी । घुड़सवार पास से निकल गये । दुर्गन्ध के मारे वे तो वहा ठहर ही नही पाये ।


तीन दिन तक करमैती ऊँट के पेट मे प्यारे श्याम के ध्यान मे पड़ी रही । चौथे दिन वहा से निकली ।  करमैती ने पहले हरिद्वार पहुँच कर भागीरथी मे स्नान किया । फिर चलते चलते वृँदावन जा पहुची । उस जमाने मे वृँदावन केवल सच्चे वैरागी वैष्णव साधुओ का केन्द्र था।


वृँदावन पहुचकर करमैती मानो आनन्दसागर मे डुब गयी । वह जंगल मे ब्रह्मकुण्ड मे रहने लगी । इधर परशुराम को कही पता नही चला तो ढुंढते ढुंढते वृँदावन पहुचे । परशुराम करमैती से साथ चलने की विनती करने लगे । तो करमैती ने अपने पिता परशुराम से कहा " पिताजी यहा आकर कौन वापस गया है ! फिर मैं तो उस प्रेममय के प्रेमसागर मे खुद को डुबो चुकी हुँ "। अपनी पुत्री की ये ज्ञानपुर्ण बातें सुकर परशुराम वापस घर आ गये ।


करमैती बाई अब वृँदावन के पास एक ब्रह्मकुण्ड नामक स्थान मे रहनी लगी जो सम्पुर्ण जंगल से घिरा हुआ था । वहा पर श्रीकृष्ण की भक्ति मे लीन रहती । करमैती बाई ने अपना शेष जीवन इसी स्थान पर गुँजारा

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