महावीर स्वामी का जीवन परिचय और उपदेश (Biography Of Mahavir Swami )--
महावीर स्वामी विक्रम संवत के पाँच सौ वर्ष पहले के भारत की बहुत बड़ी ऐतिहासिक आवश्यकता थे । इन्होनें सुख-दुख मे बंधे जीव के लिए शाश्वत दिव्य शान्ति और परम् मोक्ष का विधान किया । महावीर स्वामी जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थकर थे । जैन धर्म की स्थापना त्रिषभदेव ने की थी । महावीर स्वामी ने इसके विकास मे अहम योगदान दिया था । इन्होने जैन धर्म को पुर्ण तपोमय बना दिया ।
महावीर स्वामी का प्रारंभिक जीवन --
वैशाली राज्य की सीमा पर गण्डकी नदी के तट पर क्षत्रियकुण्डनपुर नगर के राजा सिध्दार्थ और माता त्रिशला के यहा महावीर स्वामी का जन्म हुआ था । संन्यास से पुर्व इनका नाम वर्धमान था । इनके जन्म से पहले इनकी माता को चौदह विचित्र सपने आये थे ।
चैत्र मास की शुक्ला त्रयोदशी को सोमवार के उपाकाल मे महावीर स्वामी ने शिशु वर्धमान के नामरूप जन्म लिया । शिशु का का रंग तपे सोने के समान था । शान्ति और कान्ति से शरीर शोभित और गठीत था ।
माता-पिता ने बड़ी सावधानी से उनका पालन-पोषण किया । रानी त्रिशला अत्यंत गुणवती व सुंदर थी । सिध्दार्थ और त्रिशला दोनो जैन धर्म के अनुयायी थे । उनके पवित्र संस्कारो का वर्धमान के विकास पर अमिट प्रभाव पडा़ । वर्धमान सौम्य , तेजस्वी और सुलक्षण थे । उनकी बाल्यावस्था वैभव और विलास से परिपुर्ण थी । बचपन से ही उनमे वैराग्य , तप , अनासक्ति और धर्म के भाव बढने लगे । उनमे नित्य प्रति दिव्य गुणो की वृध्दि होने लगी ।
महावीर स्वामी कैव्लय ज्ञान की प्राप्ति
कुमार वर्धमान आठ वर्ष की अवस्था मे आमल की क्रिड़ा किया करते थे । नगर के बाहर अपने साथियों के साथ जाकर संसार की अनित्यता का परिज्ञान कर मन , वचन और काया पर अधिकार रखा । वे समभाव मे रहते थे । संसार को जीवन-मरण से जलते देख कर उसके उध्दार का रास्ता सोचा शा
न्ति की खोज की । तपोमय जीवन के तेरहवें वर्ष मे जमिय ग्राम नगर के बाहर भगवती त्रिजुवालिका के उतरी पर वैशाख शुक्ल दशमी को शाल वृक्ष के नीचे महावीर को कैवल्य पद प्राप्त हुआ । संसार को तारने की शक्ति पायी और वे तीर्थकर बन गये ।
महावीर स्वामी का अंतिम समय --
महावीर स्वामी ७२ वर्ष की आयु तक जीवित रहे । एक बार श्रावस्ति नदी के मेढीय गाँव मे निवास कर रहे थे , रक्तस्त्राव आरम्भ हो गया , उनका शरीर निर्बल और क्षीण हो गया । कार्तिक अमावस्या की आधी रात को महावीर स्वामी परमगति को प्राप्त हो गये ।
महावीर स्वामी के उपदेश और शिक्षा --
* अपने आप को जीतो ! अपने आपको जीतना ही वास्तव मे दुर्जय है । अपनी आत्मा को दमन करने वाला इस लोक और परलोक मे सुखी रहता है ।
* हे पुरूष , तु ही अपना मित्र है , मित्र बाहर क्यों खोजता है ? हे पुरूष , अपनी आत्मा को ही वश मे करो । ऐसा करने से तु सभी दुखों से मुक्त होगा ।
* सभी प्राणियो को अपनी अपनी आयु प्रिय है । सुख अनुकुल है , दुख प्रतिकुल है , वध अप्रिय है , जीवन प्रिय है । सब जीव दीर्घायु होते है । सबको जीवन प्रिय है ।
* गुणो से मनुष्य साधु होता है , अवगुणो से असाधु ।
सद्गुणो को ग्रहण करो , अवगुणो को त्यागो ।
* जो अपनी ही आत्मा द्वारा अपनी आत्मा को जानकर राग व द्वेष को जानकर कर समभाव रखता है वह पुज्नीय है ।
महावीर स्वामी विक्रम संवत के पाँच सौ वर्ष पहले के भारत की बहुत बड़ी ऐतिहासिक आवश्यकता थे । इन्होनें सुख-दुख मे बंधे जीव के लिए शाश्वत दिव्य शान्ति और परम् मोक्ष का विधान किया । महावीर स्वामी जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थकर थे । जैन धर्म की स्थापना त्रिषभदेव ने की थी । महावीर स्वामी ने इसके विकास मे अहम योगदान दिया था । इन्होने जैन धर्म को पुर्ण तपोमय बना दिया ।
महावीर स्वामी का प्रारंभिक जीवन --
वैशाली राज्य की सीमा पर गण्डकी नदी के तट पर क्षत्रियकुण्डनपुर नगर के राजा सिध्दार्थ और माता त्रिशला के यहा महावीर स्वामी का जन्म हुआ था । संन्यास से पुर्व इनका नाम वर्धमान था । इनके जन्म से पहले इनकी माता को चौदह विचित्र सपने आये थे ।
चैत्र मास की शुक्ला त्रयोदशी को सोमवार के उपाकाल मे महावीर स्वामी ने शिशु वर्धमान के नामरूप जन्म लिया । शिशु का का रंग तपे सोने के समान था । शान्ति और कान्ति से शरीर शोभित और गठीत था ।
माता-पिता ने बड़ी सावधानी से उनका पालन-पोषण किया । रानी त्रिशला अत्यंत गुणवती व सुंदर थी । सिध्दार्थ और त्रिशला दोनो जैन धर्म के अनुयायी थे । उनके पवित्र संस्कारो का वर्धमान के विकास पर अमिट प्रभाव पडा़ । वर्धमान सौम्य , तेजस्वी और सुलक्षण थे । उनकी बाल्यावस्था वैभव और विलास से परिपुर्ण थी । बचपन से ही उनमे वैराग्य , तप , अनासक्ति और धर्म के भाव बढने लगे । उनमे नित्य प्रति दिव्य गुणो की वृध्दि होने लगी ।
महावीर स्वामी कैव्लय ज्ञान की प्राप्ति
कुमार वर्धमान आठ वर्ष की अवस्था मे आमल की क्रिड़ा किया करते थे । नगर के बाहर अपने साथियों के साथ जाकर संसार की अनित्यता का परिज्ञान कर मन , वचन और काया पर अधिकार रखा । वे समभाव मे रहते थे । संसार को जीवन-मरण से जलते देख कर उसके उध्दार का रास्ता सोचा शा
न्ति की खोज की । तपोमय जीवन के तेरहवें वर्ष मे जमिय ग्राम नगर के बाहर भगवती त्रिजुवालिका के उतरी पर वैशाख शुक्ल दशमी को शाल वृक्ष के नीचे महावीर को कैवल्य पद प्राप्त हुआ । संसार को तारने की शक्ति पायी और वे तीर्थकर बन गये ।
महावीर स्वामी का अंतिम समय --
महावीर स्वामी ७२ वर्ष की आयु तक जीवित रहे । एक बार श्रावस्ति नदी के मेढीय गाँव मे निवास कर रहे थे , रक्तस्त्राव आरम्भ हो गया , उनका शरीर निर्बल और क्षीण हो गया । कार्तिक अमावस्या की आधी रात को महावीर स्वामी परमगति को प्राप्त हो गये ।
महावीर स्वामी के उपदेश और शिक्षा --
* अपने आप को जीतो ! अपने आपको जीतना ही वास्तव मे दुर्जय है । अपनी आत्मा को दमन करने वाला इस लोक और परलोक मे सुखी रहता है ।
* हे पुरूष , तु ही अपना मित्र है , मित्र बाहर क्यों खोजता है ? हे पुरूष , अपनी आत्मा को ही वश मे करो । ऐसा करने से तु सभी दुखों से मुक्त होगा ।
* सभी प्राणियो को अपनी अपनी आयु प्रिय है । सुख अनुकुल है , दुख प्रतिकुल है , वध अप्रिय है , जीवन प्रिय है । सब जीव दीर्घायु होते है । सबको जीवन प्रिय है ।
* गुणो से मनुष्य साधु होता है , अवगुणो से असाधु ।
सद्गुणो को ग्रहण करो , अवगुणो को त्यागो ।
* जो अपनी ही आत्मा द्वारा अपनी आत्मा को जानकर राग व द्वेष को जानकर कर समभाव रखता है वह पुज्नीय है ।

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