संत पीपा एक विलक्षण संत थे . उनका चरित्र परम अद्भुत था , वे स्वामी रामानंद के शिष्य थे । संत कबीर और रैदास के समकालीन थे । संत पीपा की सबसे बडी़ मौलीकता यह है की उन्होने अपने विशाल राज्य को लात मारकर परमतत्व राम का भजन किया ।
संत पीपा गागरौन गढ के राजा थे । वे मेवाड़ के महाराणा कुम्भा के सम्बन्धी थे ।
संत पीपा जी का जन्म राजस्थान के गांगरौन ( झालावाड़ ) मे हुआ था । बाल्याकाल से ही आपके अंदर भक्तिभावना अंकुरित थी , वे देवी भगवती के परम भक्त थे । इनका मन राजसी कार्यो मे नही लगा आपकी बारह रानिया थी । आप साधु संतो की सेवा मे हमेशा तत्पर रहते थे ।
एक रात पीपा जी सो रहे थे , उन्हें एक स्वप्न आया जिसमे देवी ने उनको आदेश दिया की काशी जाकर स्वामी रामानंद जी से दीक्षा लो । स्वप्न समाप्त होने पर आंखे खुल गई । उन्होनें देवी के आदेशानुसार रात्रि के समय काशी की ओर निकल पडे़ । भगवान को पाने के लिए वे इतने उत्सुक थे की उनके लिए परम सुलभ राजसुख और विनश्वर भोग्य पदार्थो मे निरसता ही निरसता दिखने लगी ।
काशी मे स्वामी रामानंद जी के सामने कडी़ से कडी़ परीक्षा का सामना करना पड़ा । गंगा ने स्नान कर वे रामानंद जी की कुटी मे आये , लेकीन रामानंद जी ने मिलने से इन्कार कर दिया और कहा मैं राजाओ से नही मिलता । ये सुनकर राजा पीपा ने अपने राजसी वस्त्र उतार दिये और सादे वस्त्र पहनकर उनके सामने गये । स्वामी रामानंद ने उन्हें कुँए मे कुदने के लिए कहा , पीपा कुँए मे कुदने ही जा रहे थे की रामानंद जी ने उनको मना किया । पीपा जी का यह आचरण देखकर रामानंद जी उनसे बहुत प्रसन्न हुए और उन्हे दीक्षा दी ।
वे विरक्त वेष मे अपनी राजधानी लौट आऐ । कुछ दिनो के बाद संत पीपा रामानंद जी के दर्शन हेतु व्याकुल हो उठे , और उन्होने अपने गुरू को गांगरौन आने का निमन्त्रण भेजा । स्वामी रामानंद जी अपने 40 शिष्यो के साथ गांगरौन पधारे , इस यात्रा मे संत कबीर और रैदास भी उनके साथ थे । संत पीपा ने गुरूदेव के स्वागत के लिए विशेष उत्सव किया , शोभा यात्रा निकाली , गुरू को पालकी मे बिठाकर राजधानी मे प्रवेश करवाया ।
कुछ दिनो तक गांगरोन मे निवास करने के बाद रामानंद जी ने द्वारिका जाने की इच्छा प्रकट की । पीपा भी साथ जाना चाहते थे , इनकी बारह रानियो ने भी साथ चलने की इच्छा प्रकट की लेकीन पीपा जी ने उन्हें सारे राजसी सुख और राजसी वैभव त्याग कर साथ चलने को कहा लेकीन सभी ने मना कर दिया । पीपा जी की एक रानी सीता वह उनके साथ चलने को तैयार हुई । कई दिनो की यात्रा के बाद वे द्वारिका पहुचें । द्वारिका मे संत पीपा का मन लग गया । कुछ समय निवास करने के बाद रामानंद व उनकी शिष्य मण्डली काशी चले गये लेकीन संत पीपा और उनकी पत्नी द्वारिका ही ठहर गये ।
संत पीपा नित्य भगवान कृष्ण के मन्दिर जाया करते थे , उनका ये भगवद्प्रेम निरन्तर बढता जा रहा था । वे भगवान कृष्ण के दर्शन को ही अपने जीवन का एकमात्र धेय समझते थे ।
ऐसा कहा जाता है की एक संत पीपा भगवान कृष्ण के दर्शन हेतु इतने व्याकुल हो गये की भावावेश मे समुद्र मे कूद पड़े । द्वारिकाधीश की कृपा से उनका बाल भी बाँका न हुआ । समुद्र मे उन्हें भगवान कृष्ण व रूक्मणी जी के प्रत्यक्ष दर्शन हुआ , वे भगवान के धाम 7 दिन तक रहे ।
संत पीपा जी के जीवनकाल मे अनेक चमत्कार देखे गये है । ऐसा कहा जाता है की सिंह भी संत पीपा के सम्पर्क मे आकर हिंसावृति को त्याग देता था ।
संत पीपाजी महाराज ने भक्ति के साथ साथ ऐसा कार्य करने की प्रेरणा दी , जिससे किसी प्रकार का पाप न हो , जिस काम से किसी को किसी प्रकार का नुकसान न हो । तब संत पीपाजी ने चुई-धागे से कपड़े सिलने का कार्य प्रारम्भ किया । इस पथ पर इनके बहुत से अनुयायी ने भी यह कार्य शुरू किया । जो आज "पीपा दर्जी समाज" के नाम से जाने जाते है ।
संत पीपा जी का अंतिम समय राजस्थान के टोंक जिले टोडा गाँव मे बिता । टोडा के राजा सुरजसेन ने गाँव के बाहर इनके लिए एक कुटी का निर्माण करवाया था ।
R e a d m o r e
काशी के संत हरिहर बाबा
महावीर स्वामी का जीवन परिचय और उपदेश
अवधूत बाबा शिवानंद
संत पीपा गागरौन गढ के राजा थे । वे मेवाड़ के महाराणा कुम्भा के सम्बन्धी थे ।
संत पीपा का जीवन परिचय (biography of sant pipa)
संत पीपा जी महाराज का इतिहास -
संत पीपा जी का जन्म राजस्थान के गांगरौन ( झालावाड़ ) मे हुआ था । बाल्याकाल से ही आपके अंदर भक्तिभावना अंकुरित थी , वे देवी भगवती के परम भक्त थे । इनका मन राजसी कार्यो मे नही लगा आपकी बारह रानिया थी । आप साधु संतो की सेवा मे हमेशा तत्पर रहते थे ।
स्वामी रामानंद जी से दिक्षा -
एक रात पीपा जी सो रहे थे , उन्हें एक स्वप्न आया जिसमे देवी ने उनको आदेश दिया की काशी जाकर स्वामी रामानंद जी से दीक्षा लो । स्वप्न समाप्त होने पर आंखे खुल गई । उन्होनें देवी के आदेशानुसार रात्रि के समय काशी की ओर निकल पडे़ । भगवान को पाने के लिए वे इतने उत्सुक थे की उनके लिए परम सुलभ राजसुख और विनश्वर भोग्य पदार्थो मे निरसता ही निरसता दिखने लगी ।
काशी मे स्वामी रामानंद जी के सामने कडी़ से कडी़ परीक्षा का सामना करना पड़ा । गंगा ने स्नान कर वे रामानंद जी की कुटी मे आये , लेकीन रामानंद जी ने मिलने से इन्कार कर दिया और कहा मैं राजाओ से नही मिलता । ये सुनकर राजा पीपा ने अपने राजसी वस्त्र उतार दिये और सादे वस्त्र पहनकर उनके सामने गये । स्वामी रामानंद ने उन्हें कुँए मे कुदने के लिए कहा , पीपा कुँए मे कुदने ही जा रहे थे की रामानंद जी ने उनको मना किया । पीपा जी का यह आचरण देखकर रामानंद जी उनसे बहुत प्रसन्न हुए और उन्हे दीक्षा दी ।
वे विरक्त वेष मे अपनी राजधानी लौट आऐ । कुछ दिनो के बाद संत पीपा रामानंद जी के दर्शन हेतु व्याकुल हो उठे , और उन्होने अपने गुरू को गांगरौन आने का निमन्त्रण भेजा । स्वामी रामानंद जी अपने 40 शिष्यो के साथ गांगरौन पधारे , इस यात्रा मे संत कबीर और रैदास भी उनके साथ थे । संत पीपा ने गुरूदेव के स्वागत के लिए विशेष उत्सव किया , शोभा यात्रा निकाली , गुरू को पालकी मे बिठाकर राजधानी मे प्रवेश करवाया ।
तीर्थ - यात्राऐ -
कुछ दिनो तक गांगरोन मे निवास करने के बाद रामानंद जी ने द्वारिका जाने की इच्छा प्रकट की । पीपा भी साथ जाना चाहते थे , इनकी बारह रानियो ने भी साथ चलने की इच्छा प्रकट की लेकीन पीपा जी ने उन्हें सारे राजसी सुख और राजसी वैभव त्याग कर साथ चलने को कहा लेकीन सभी ने मना कर दिया । पीपा जी की एक रानी सीता वह उनके साथ चलने को तैयार हुई । कई दिनो की यात्रा के बाद वे द्वारिका पहुचें । द्वारिका मे संत पीपा का मन लग गया । कुछ समय निवास करने के बाद रामानंद व उनकी शिष्य मण्डली काशी चले गये लेकीन संत पीपा और उनकी पत्नी द्वारिका ही ठहर गये ।
संत पीपा नित्य भगवान कृष्ण के मन्दिर जाया करते थे , उनका ये भगवद्प्रेम निरन्तर बढता जा रहा था । वे भगवान कृष्ण के दर्शन को ही अपने जीवन का एकमात्र धेय समझते थे ।
चमत्कार -
ऐसा कहा जाता है की एक संत पीपा भगवान कृष्ण के दर्शन हेतु इतने व्याकुल हो गये की भावावेश मे समुद्र मे कूद पड़े । द्वारिकाधीश की कृपा से उनका बाल भी बाँका न हुआ । समुद्र मे उन्हें भगवान कृष्ण व रूक्मणी जी के प्रत्यक्ष दर्शन हुआ , वे भगवान के धाम 7 दिन तक रहे ।
संत पीपा जी के जीवनकाल मे अनेक चमत्कार देखे गये है । ऐसा कहा जाता है की सिंह भी संत पीपा के सम्पर्क मे आकर हिंसावृति को त्याग देता था ।
दर्जी समाज और संत पीपाजी -
संत पीपाजी महाराज ने भक्ति के साथ साथ ऐसा कार्य करने की प्रेरणा दी , जिससे किसी प्रकार का पाप न हो , जिस काम से किसी को किसी प्रकार का नुकसान न हो । तब संत पीपाजी ने चुई-धागे से कपड़े सिलने का कार्य प्रारम्भ किया । इस पथ पर इनके बहुत से अनुयायी ने भी यह कार्य शुरू किया । जो आज "पीपा दर्जी समाज" के नाम से जाने जाते है ।
अंतिम समय -
संत पीपा जी का अंतिम समय राजस्थान के टोंक जिले टोडा गाँव मे बिता । टोडा के राजा सुरजसेन ने गाँव के बाहर इनके लिए एक कुटी का निर्माण करवाया था ।
R e a d m o r e
काशी के संत हरिहर बाबा
महावीर स्वामी का जीवन परिचय और उपदेश
अवधूत बाबा शिवानंद

Todaraisingh me guru mata ki samdhi bhi h
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