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गुरू नानकदेव जी के पुत्र श्रीचंद्र मुनि जी की जीवनी - Biography of Guru nanak's Son srichand muni |


श्रीचंद्र मुनि जी उदासीन संप्रदाय के आचार्य थे । श्रीचंद्र मुनि गुरू नानकदेव के पुत्र थे ।  इन्होने "मात्राशास्त्र" की रचना की जो इनकी प्रसिध्द कृति है , इसके अलावा इन्होने वेद , ब्रह्मसुत्र और भगवद्गीता पर भाष्य लिखा ।


गुरू नानकदेव जी के पुत्र श्रीचंद्र मुनि जी की जीवनी - Biography of Guru nanak's Son srichand muni


परम उदासी , असाधारण वैरागी और भगवान के विलक्षण अनुरागी महात्मा श्रीचंद ने आचार्य शंकर की तरह भारतीय संस्कृति और आध्यातम ज्ञान का संरक्षण किया । उन्होने जीवमात्र को भवसागर से पार उतारने के लिए सुगम और अाचारमुलक़ भक्ति का पथ प्रशस्त किया । श्रीचंद ने धर्म की मर्यादा सुरक्षित की , वे जन्मजात योगी थे । उन्होने ज्ञानयोग की साधना की । महात्मा श्रीचंद ने धर्माचरण का शंखनाद किया । इन्होने भारतीय जीवन को वैदिक मर्योदा से सम्पन्न कर सनातन धर्म को गौरण बढाया ।



जन्म और बचपन -


श्री चंद्र जी का जन्म 8 सितंबर 1494 मे तलवण्डी गाँव मे गुरू नानकदेव जी और माता सुलक्खनी के घर हुआ । इस समय नानकदेवजी बत्तीस वर्ष के थे । महात्मा श्री चंद्र जी के जन्म के समय संत नानक जी घर के बाहर बैठकर सत्संग कर रहे थे । उनकी बहन नानकी ने सुचना दी की उनके घर एक तेजस्वी बालक ने जन्म लिया है ।

दुसरे पुत्र लक्ष्मीचंद्र के जन्म के बाद संत नानकदेव जी संन्यास ले लिया और सत्य की खोज मे निकल पड़े । श्री चंद्र पिता के वैराग्य-संस्कार से बहुत प्रभावित हुए । वे अन्य बालको से बहुत कम मिलते थे । दुर से ही निर्लिप्त भाव से उनके खेल देखा करते थे । एकांत मे ही उनका मन लगता था । घर वालो को विश्वास हो गया था श्रीचंद भी पिता की तरह सन्यास ले लेंगे ।


आध्यात्मिक जीवन -


अविनाशी मुनि से संन्यास की दीक्षा ली । दीक्षा लेने के बाद उन्होनें धर्म-प्रचार के लिए भारत के पवित्र तीर्थ स्थलों की यात्रा की । वे ब्रज , काशी और प्रयाग भी गये । कश्मीर मे महात्मा श्री चंद्र जी ने वेद , ब्रह्मसुत्र और भगवद्गीता पर भाष्य लिखा । इन्होनें "मात्राशास्त्र" की रचना की ।


अंतिम समय - 


आचार्य श्री चंद्र बारठ से होते हुए चम्बा आए । भगवती रावी के तट पर वे एकांत साधना करने लगे । एक दिन प्रभात होने से पहले वे रावी के पार चले गये और वन पार्वतीय-प्रदेश मे हमेशा के लिए चले गये । इसके बाद वे कभी नही देखे गये ।


महात्मा श्री चंद्र जी के उपदेश -


गुरू अविनाशी खेंल रचाया ।
अगम - निगम का पंथ बताया ।।

निराश मठ निरन्तर ध्यान ।
निभर्व नगरी दीपक गुरूज्ञान ।।

अकल की बरछी गुणो की कटारी ।
मन को मारि करो असवारि ।।

भाव भोजन अमृत कर पाया ।
भला  बुरा  मन  बसाया ।।

सहज विरागी के विराग ।
माया मोहनी सकल त्याग ।।


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