रविंद्र नाथ टैगोर का जन्म बंगाल में हुआ था और वे बंगाली थे , फिर भी वे केवल बंगाल और भारत के नहीं वरन सम्पूर्ण विश्व की विभूति थे | जिस प्रकार व्यास , वाल्मीकि , कलिदास , तुलसीदास और कबीर किसी देश या प्रान्त के नहीं सम्पूर्ण विश्व के लिए पूजनीय है , उसी प्रकार रविंद्रनाथ समस्त मानव जगत की सम्पति है |
रविंद्रनाथ नाथ का जन्म कोलकाता के जोड़ासांको मुह्हले में हुआ | उनके पिता का नाम महर्षि देवेन्द्रनाथ ठाकुर था और माता का नाम शारदा देवी | वे अपने पिता के सबसे छोटे पुत्र थे | रविंद्रनाथ बहुत भाग्यशाली थे | उनका जन्म ऐसे परिवार में हुआ जिसमे लक्ष्मी और सरस्वती की बराबर कृपा थी | इनके परिवार में बड़े - बड़े विचारक , तत्वज्ञानी , संगीतज्ञ , कलाकार , विद्वान हो चुके थे |
रविंद्रनाथ छोटी अवस्था के थे , तभी उनकी माता का देहांत हो गया था | उनका लालन - पालन और देख -भाल घर के दास दसियों द्वारा ही किया गया था | इनकी पढ़ाई के लिए ग्रह शिक्षक नियुक्त किये गए लेकिन इनका मन पढ़ाई में नहीं लगा | स्कूल भी भेजे गए लेकिन वहा से भी भाग निकले | रविंद्रनाथ बचपन से ही स्वतंत्र प्रकृति के थे | रविंद्रनाथ प्रकृति के प्रेमी थे , स्कूल और कॉलेज उनकी अनुकूल नहीं थे |
बचपन में उन्हें अपने पिता से साथ हिमालय जाने मौका मिला | इस भृमण में इन्होने अपने पिता से कुछ अंग्रेजी , कुछ हिंदी , और कुछ ज्योतिष का ज्ञान मिला | इनके घर में रोजाना सह्त्यिक चर्चा और संगीत चर्चा हुआ करती थी | इसलिए छुटपन से ही इनका मन कला , संगीत , कविताओं के प्रति लगाव हो गया |
मात्र 11 वर्ष की आयु में इन्होने " सङ्कर शिव संकटहारी " गान गाकर ख्याति अर्जित कर ली थी | निरंतर साहित्यक चर्चा और संगीत चर्चा में प्रतिपालित होने के कारण बचपन से ही कवित्व शक्ति दिखलाई देती थी |
इन्होने वैष्णव कवियों की कविताए पढ़ कर कितनी ही कविताए रच डाली थी |
रविंद्रनाथ अपने बड़े भाई के साथ कुछ समय अहमदाबाद रहे थे , वह इन्होने अंग्रेजी साहित्य के बड़े बड़े ग्रंथ पड़े और भाव अवलम्बन कर बांग्ला भाषा में लेख लिखे |
नाम
-
रवींद्रनाथ टैगोर
|
जन्मदिन -
7
मई 1861
|
उपाधि - लेखक
और चित्रकार
|
प्रमुख रचना - गीतांजलि
|
पुरस्कार - नोबेल पुरस्कार
|
मृत्यु
- 7 अगस्त 1947
|
प्रारम्भिक जीवन ( Rabindranath Tagore Early Life)
रविंद्रनाथ नाथ का जन्म कोलकाता के जोड़ासांको मुह्हले में हुआ | उनके पिता का नाम महर्षि देवेन्द्रनाथ ठाकुर था और माता का नाम शारदा देवी | वे अपने पिता के सबसे छोटे पुत्र थे | रविंद्रनाथ बहुत भाग्यशाली थे | उनका जन्म ऐसे परिवार में हुआ जिसमे लक्ष्मी और सरस्वती की बराबर कृपा थी | इनके परिवार में बड़े - बड़े विचारक , तत्वज्ञानी , संगीतज्ञ , कलाकार , विद्वान हो चुके थे |
रविंद्रनाथ छोटी अवस्था के थे , तभी उनकी माता का देहांत हो गया था | उनका लालन - पालन और देख -भाल घर के दास दसियों द्वारा ही किया गया था | इनकी पढ़ाई के लिए ग्रह शिक्षक नियुक्त किये गए लेकिन इनका मन पढ़ाई में नहीं लगा | स्कूल भी भेजे गए लेकिन वहा से भी भाग निकले | रविंद्रनाथ बचपन से ही स्वतंत्र प्रकृति के थे | रविंद्रनाथ प्रकृति के प्रेमी थे , स्कूल और कॉलेज उनकी अनुकूल नहीं थे |
बचपन में उन्हें अपने पिता से साथ हिमालय जाने मौका मिला | इस भृमण में इन्होने अपने पिता से कुछ अंग्रेजी , कुछ हिंदी , और कुछ ज्योतिष का ज्ञान मिला | इनके घर में रोजाना सह्त्यिक चर्चा और संगीत चर्चा हुआ करती थी | इसलिए छुटपन से ही इनका मन कला , संगीत , कविताओं के प्रति लगाव हो गया |
मात्र 11 वर्ष की आयु में इन्होने " सङ्कर शिव संकटहारी " गान गाकर ख्याति अर्जित कर ली थी | निरंतर साहित्यक चर्चा और संगीत चर्चा में प्रतिपालित होने के कारण बचपन से ही कवित्व शक्ति दिखलाई देती थी |
इन्होने वैष्णव कवियों की कविताए पढ़ कर कितनी ही कविताए रच डाली थी |
रविंद्रनाथ अपने बड़े भाई के साथ कुछ समय अहमदाबाद रहे थे , वह इन्होने अंग्रेजी साहित्य के बड़े बड़े ग्रंथ पड़े और भाव अवलम्बन कर बांग्ला भाषा में लेख लिखे |
पहली कविता का प्रकाशन -
मात्र 13 वर्ष की आयु में इनकी प्रथम मुद्रित कविता प्रकाशित हुई थी | "तत्त्व बोधिनी " पत्रिका में " अभिलाषा " नाम की कविता प्रकाशित हुई |
इसके बाद इनकी कविताए " भारती " नामक पत्रिका में प्रकाशित हुई | इसके बाद " करुणा " नामक उपन्यास छपता रहा |
यही से उनके साहित्यिक जीवन की शुरुआत हुई |
शिक्षा -
17 वर्ष की आयु में विद्याध्ययन के लिए इंग्लैंड गए | वहा जाकर पहले स्कूल और फिर लंदन यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया | वह अच्छे अच्छे लोगो के संपर्क में आने का मौका मिला | वही उन्होंने "भरथरी " नामक एक गाथा की रचना की |
वह उनका मन नहीं लगा और भारत लौट आये | भारत आकर इन्होने " वाल्मीकि प्रतिभा " और " भागना हृदय " की रचना की |
शांति निकेतन की स्थापना-
1901 के आस पास इनके मन में अध्यात्म के भाव उमड़ने लगे | इसी को लेकर इन्होने 1901 " नैबेद्य " की रचना की | इसमें प्राचीन भारतीय ऋषि - मुनियो की परम्परा के बारे में बताया हुआ है | इनके मन में एक आश्रम स्थापना का विचार आया |
अतः 1901 में शांति निकेतन की स्थापना की गयी | यह बर्ह्मचर्य आश्रम है जिसमे भारतीय प्राचीन परम्परा की शिक्षा दी जाती है | वर्तमान में यह संस्था " विश्व भारती " के नाम से जानी जाती है |
पत्नी का देहांत(Wife's death)-
रवींद्रनाथ टैगोर जी की पत्नी का देहांत 1902 में हुआ था | इसके 1 के भीतर इनकी मझली पुत्री भी चल बसी | 1903 में अपनी कन्या को वायु परिवर्तन करवाने के लिए अल्मोड़ा गए |
वही इन्होने " शिशु " नाम का काव्य रचा |
गीतांजलि की रचना और नोबेल पुरस्कार -
यह समय इनके अध्यात्म जीवन का मधयपहृ था | इन दिनों आत्मा और ब्रह्म की उपलब्धि की चेष्टा ही इनका प्रधान कार्य था | इनकी कविताए और लेखो का मुख्या लक्षण अध्यात्मिक्तावादी था |
ऐसी कड़ी में इन्होने 1910 में " गीतांजलि " नामक उपन्यास रचा | इस पुस्तक ने इनकी ख्याति सारे संसार में फैला दी | गीतांजलि प्रकाशित होने के रविंद्रनाथ 3 बार इंग्लैंड गए |
इसे पढ़कर आयरलैंड के प्रसिद्ध कवी श्री यीट्स इनसे बड़े प्रभावित हुए और बहुत से कवि इनपर मुग्ध हो गए |
अब रविंद्रनाथ जी की ख्याति यूरोप और अमेरिका में भी फ़ैल गयी | 1913 में इन्हे "नोबेल पुरस्कार " से सम्मानित किया गया |
नोबेल पुरस्कार पा लेने के बाद कलकत्ता विश्वविद्यालय ने डॉक्टर की उपाधि देकर अपने आप को गौरवान्वित किया |
देश वापसी पर स्वागत -
इंग्लैंड से लौटने पर रविंद्र नाथ " शांति निकेतन " पहुंचे | उनको बधाई देने के लिए कलकत्ता से शांति निकेतन से लिए एक स्पेशल ट्रैन से 200 भारतीय और यूरोपियन लोग पहुंचे |
तब गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर ने कहा " मेरे साहित्यिक जीवन में देशवासियो द्वारा सदा मेरा विरोध किया गया , आज जब पच्छिम ने मेरी शक्ति स्वीकार कर ली तो देशवासी फुल्ले नहीं समाते , इसलिए आप लोग जो सम्मान का प्याला मेरे लिए लेकर आये है , उसे में केवल छू सकता हु , हृदय से नहीं पी सकता "
रविंद्रनाथ टैगोर का स्वर्गवास -
गुरुदेव रविंद्रनाथ ने जितना लिखा उतना कदाचित किसी दूसरे ने लिखा होगा | परन्तु वे केवल कवी , नाट्यकार या उपन्यास लेखक ही नहीं वरन गायक , अभिनेता , चित्रकार , रचयिता ,दार्श्निक ,पत्रकार और अध्यापक भी थे |
इन सभी कामो ने उन्हें ख्याति लाभ की थी | अपनी लेखनी से मानव सेवा करने के बाद विश्वकवी ने श्रावणी पूर्णिमा (7 अगस्त 1941 ) को अपनी जीवन लीला समाप्त की |
भारत के इतिहास में उन्हें वही स्थान प्राप्त है जो प्राचीन महान विचारक और कवियों को प्राप्त है |

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