हल्दीघाटी के युद्ध के बाद महाराणा प्रताप की शक्ति क्षीण हो गयी | हल्दीघाटी के युद्ध के बाद महाराणा जंगलो में चले गए और वह से स्थानीय भीलो और राजपूतो की एक शक्तिशाली सेना बनाई | दिवेर युद्ध की योजना मांकियावास के जंगलो में बनाई |
दिवेर का भयंकर युद्ध -
दिवेर का युद्ध 1582 में हुआ था इस युद्ध में मुगलों की सेना का नेतृत्व अकबर के चाचा सुल्तान खान कर रहे थे और मेवाड़ की सेना को 2 हिस्सों में बाँटा गया | 1 टुकड़ी का नेतृत्व स्वयं महाराणा प्रताप कर रहे थे और दूसरी का उनके पुत्र अमर सिंह कर रहे थे |
दिवेर के शाही थाने पर हमला -
दिवेर के शाही थाने पर पहला हमला अमर सिंह के नेतृत्व वाली टुकड़ी ने किया | जिससे मुगलों की सेना में भगदड़ मच गयी | | ऐसा कहा जाता है की इस युद्ध में अमर सिंह ने अकबर के चाचा सुल्तान खान को भाले के एक प्रहार से शरीर समेत घोङे को चीरता हुआ जमीं में जा धसा |
महाराणा प्रताप ने अकबर के सबसे ताकतवर सूबेदार बहलोल खान पर अपनी तलवार एक वार से बहलोल खान समेत उसके घोड़े को काट डाटा था |
इसके बाद मेवाड़ में यह कहावत बन गयी की " मेवाड़ के योद्धा अपने दुश्मन को घोड़े समेत काट डालते है "
महाराणा ने अपने खोये क्षेत्र को वापस प्राप्त किया -
दिवेर के युद्ध के बाद महाराणा प्रताप ने वापस अपने खोये हुए क्षेत्रो पर वापस कब्ज़ा कर दिया | चावंड , मांडलगढ़ ,कुम्भलगढ़ , जावर जैसे ठिकानो पर कब्ज़ा किया |
महाराणा प्रताप ने चावंड के लूणा राठौर को हरा कर चावंड पर अधिकार कर लिया और चावंड को अपनी नयी राजधानी बनाया |
महाराणा प्रताप का देहांत चावंड में 19 जनवरी 1597 में हुआ | चावंड क्षेत्र के बण्डोली गांव मे राणा प्रताप का आत्म संस्कार हुआ |

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