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जब महाराणा प्रताप ने अकबर को संधि पत्र भेजा (When Maharana Pratap sent the treaty letter to Akbar)






हल्दीघाटी के युद्ध के बाद महाराणा प्रताप अपने परिवार सहित जंगलो में चले गए | उस समय परिस्थितियाँ इतनी खराब हो गयी की महाराणा और उनका परिवार घास की रोटी खाने लगे |


एक दिन महाराणा प्रताप के पुत्र अमर सिंह रोटी खा रहे थे लेकिन तभी एक जंगली ब्याव (जंगली बिल्ली  ) उनकी रोटी छिनकर भाग जाती है | भूख के मारे  बालक अमरसिंह रोने लगे यह देखकर राणा प्रताप का ह्रदय करुणा से भर गया | उन्होंने सोचा मैंने अपने पुरे जीवन को इस मातृभूमि के लिए न्योछावर कर दिया लेकिन बदले में मुझे क्या मिला | ये पुत्र -पुत्रिया  दो वक्त की रोटी के लिए तरसते है |

जब महाराणा प्रताप ने अकबर को संधि पत्र भेजा -



 महाराणा प्रताप अकबर को संधि पत्र भेजते है | वो पत्र जब अकबर ने पढ़ा तो उसे भरोसा ही नहीं हुआ | अकबर बड़ा धूर्त था | उसने एक चाल की इस पत्र को वह महाराणा के सबसे बड़े भक्त  पृथ्वीराज सिंह राठौर को दिल्ली  बुलाया | जो हमेशा महाराणा की वीरता का गुणगान करते थे | पृथ्वीराज राठौर बिकारनेर नरेश के छोटे भाई थे |


जब अकबर ने वो पत्र पृथ्वीराज सिंह को दिखाया को उन्हें भरोसा नहीं हुआ और उन्होंने इस पत्र की सच्चाई जानने के लिए महाराणा प्रताप को एक पत्र लिखा -

पृथ्वीराज ने कहा-   

 "महाराणा मैंने सुना अब शेर बकरियों के साथ में रहेगा |
    मैंने सुना है अब सूर्य बादल के पीछे चुप जाएगा ||

    मैंने सुना है चातक धरती का पान पियेगा |
    मैंने सुना है अब हठी कुत्ते सा जीवन व्यतीत करेगा | |

  आपकी सौगंध मैंने सुना है अब रजपूती विधवा हो जाएगी |
  तलवार अब दुश्मन की छाती की जगह म्यान में विश्राम करेगी ||

   ऐसी बाते सुनकर मेरी मुछे भी नीची हो रही है


पृथ्वीराज सिंह राठौर का पत्र पढ़कर राणा प्रताप की आँखे गुस्से से लाल हो गयी | उनका खोया हुआ स्वाभिमान वापस आ गया |  उन्होंने पृथ्वीराज को पत्र लिखा |

                           
  धिक्कार है मुझे मैंने कायरतापूर्ण कार्य किया है |
  मैं भूखा प्यासा रहकर भी मेवाड़ को आज़ाद रखूँगा ||

   मैं राजपूतानी का जाया हुआ हूँ  राजपूती क़र्ज़ चुकाऊंगा |
    यह शीश कट जाएगा लेकिन पगड़ी नीचे नहीं होगी |
       मैं दिल्ली का मान घटाउँगा ||


  बादल में में क्षमता कहा जो उगते सूर्य को रोक सके  |
  ऐसे सियार ने कभी जन्म नहीं लिया को शेर की मार सह सके ||

  धरती का पानी पिए चातक  ऐसी चोच बनी नहीं |
    कुत्ते की तरह जीवन जीने वाले हठी की बात मेने सुनी नहीं ||
         

  इन हाथो में जबतक तलवार है तबतक रजपूती को कोई विधवा नहीं कह सकता |
म्यान के बदले यह तलवार दुश्मनो के छाती में जाएगी ||

अपनी मुछो को हमेशा ताने हुए रखना चिंता मत करना |
खून की नदिया बहा दूंगा ||

मैं अंत तक उस अकबर से लडूंगा |
उजड़े हुए मेवाड़ को फिर से बसा दूंगा ||



बीकानेर के पृथ्वीराज सिंह राठौर ने महाराणा प्रताप की सोई हुई चेतना को फिर से जाग्रत किया | इसके बाद महाराणा ने बहुत से युद्ध लड़े और अपने खोये हुए क्षेत्रो को फिर से प्राप्त किया |


दिवेर का भयंकर युद्ध (Maharana vs Mughal) 

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